अरावली पर्वत माला, दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक, भारत के उत्तर-पश्चिमी
अरावली संकट की शुरुआत
अरावली पर्वत माला, दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक, भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से (दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात) में फैली हुई है। यह न सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता का खजाना है, बल्कि थार मरुस्थल के पूर्व की ओर फैलाव को रोकने वाली हरी ढाल (green barrier), दिल्ली-NCR की हवा-जल संरक्षण और जैव विविधता का आधार भी है। लेकिन हाल ही में खनन (mining) से जुड़े विवाद ने इसे खतरे में डाल दिया था।
अरावली संकट की शुरुआत –
नवंबर 2025 का फैसला
20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट (तब CJI बी.आर. गवई की बेंच) ने पर्यावरण मंत्रालय की एक कमिटी की सिफारिशों को मंजूरी दी। नई परिभाषा के मुताबिक:
अरावली हिल: स्थानीय स्तर से 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊँची भूमि।
अरावली रेंज: 500 मीटर के दायरे में दो या ज्यादा ऐसी हिल्स।
इससे राजस्थान में कुल 12,081 हिल्स में से सिर्फ 1,048 ही संरक्षण के दायरे में आते, बाकी हिस्से खनन और निर्माण के लिए खुल सकते थे। पर्यावरणविदों ने इसे “विनाशकारी” बताया, क्योंकि इससे जलस्तर गिरना, प्रदूषण बढ़ना और मरुस्थलीकरण तेज हो सकता था।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा यू-टर्न
29 दिसंबर 2025 का स्टे
जनता के भारी विरोध, सोशल मीडिया कैंपेन (#SaveAravalli) और पर्यावरण संगठनों के दबाव के बाद चीफ जस्टिस सूर्यकांत की तीन जजों वाली बेंच ने सुओ मोटू (खुद संज्ञान) लिया।
29 दिसंबर 2025 को फैसला सुनाया:
नवंबर 2025 का पूरा आदेश अभी लागू नहीं होगा (put in abeyance/stay)।
नई हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमिटी बनेगी, जो पूरी तरह से जांच करेगी – ऊँचाई, पारिस्थितिकी, खनन के प्रभाव आदि।
कोई नया खनन लीज नहीं दिया जाएगा, कोई अपरिवर्तनीय कदम नहीं उठाया जाएगा।
अगली सुनवाई:
21 जनवरी 2026 ।
यह फैसला पर्यावरण प्रेमियों के लिए बड़ी जीत है। कई लोगों ने इसे “जनता की ताकत” कहा।
आगे क्या?
नई कमिटी की रिपोर्ट आने तक संरक्षण बरकरार रहेगा।
केंद्र और चार राज्य (राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, गुजरात) को नोटिस जारी।
अगर नई परिभाषा से संरक्षण कमजोर हुआ तो फिर से सख्त कदम उठ सकते हैं।
अरावली सिर्फ पहाड़ियाँ नहीं – हमारी जल सुरक्षा, हवा और जलवायु का ढाल है। #SaveAravalli अभियान जारी रहेगा । जय हिन्द

