भारत में पेड़ों की कटाई (डिफॉरेस्टेशन) और पहाड़ों को तोड़ने (हिल कटिंग, ब्लास्टिंग) की समस्या काफी गंभीर है, और इससे लोगों के जीने में कई समस्याएँ हो रही हैं। लेकिन पूरी तस्वीर थोड़ी मिश्रित है सरकारी डेटा के अनुसार कुल फॉरेस्ट कवर बढ़ रहा है, जबकि इंडिपेंडेंट सोर्स बताते हैं कि नेचुरल घने जंगलों का नुकसान हो रहा है। मैं आपको फैक्ट्स के आधार पर समझाता हूँ।
वर्तमान स्थिति :
सरकारी रिपोर्ट (India State of Forest Report 2023) : भारत का कुल फॉरेस्ट और ट्री कवर 25.17% तक पहुँच गया है, जो पहले से थोड़ा बढ़ा है। लेकिन इसमें प्लांटेशन (व्यावसायिक पेड़) शामिल हैं, जबकि घने नेचुरल जंगलों में कमी आई है।
ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच (2024-2025 डेटा) : 2024 में भारत ने 18,200 हेक्टेयर प्राइमरी (घने पुराने) जंगल खोए। 2001 से अब तक 2.3 मिलियन हेक्टेयर ट्री कवर लॉस हुआ, खासकर नॉर्थईस्ट राज्यों (असम, मिजोरम, अरुणाचल आदि) में।
मुख्य कारण: शिफ्टिंग कल्टिवेशन, एग्रीकल्चर, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, माइनिंग और इल्लीगल लॉगिंग।
पहाड़ तोड़ने की समस्या :
हिमालयी क्षेत्रों (हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम आदि) में रोड्स, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, टनल्स और माइनिंग के लिए बड़े पैमाने पर ब्लास्टिंग और हिल कटिंग हो रही है।
इससे स्लोप्स कमजोर हो जाते हैं, जिससे लैंडस्लाइड्स और फ्लैश फ्लड्स बढ़ रहे हैं।
उदाहरण: 2024 वायनाड लैंडस्लाइड (केरल), उत्तराखंड और हिमाचल में क्लाउडबर्स्ट से सैकड़ों मौतें। विशेषज्ञ कहते हैं कि डिफॉरेस्टेशन और अनियंत्रित कंस्ट्रक्शन से ये आपदाएँ बदतर हो रही हैं।
लोगों को जीने में समस्याएँ:
हाँ, ये सीधे लोगों की जिंदगी प्रभावित कर रही हैं:
बाढ़ और लैंडस्लाइड्स : जंगलों के बिना मिट्टी पानी सोख नहीं पाती, रनऑफ बढ़ता है → बाढ़। पहाड़ों पर पेड़ न होने से लैंडस्लाइड। हजारों लोग मर चुके हैं, घर-गाँव तबाह हो रहे हैं (जैसे वायनाड में 250+ मौतें)।
सूखा और पानी की कमी : पेड़ पानी साइकिल को मेंटेन करते हैं। कटाई से कम बारिश, ग्राउंडवाटर कम → सूखा, फसलें खराब, पानी की समस्या (शहरों और गाँवों में)।
मिट्टी का कटाव और प्रदूषण : मिट्टी बह जाती है → कृषि भूमि बंजर। एयर क्वालिटी खराब (धूल, CO2 बढ़ना)।
जैव विविधता और आजीविका : आदिवासी और लोकल कम्युनिटीज पर असर – जंगल से मिलने वाली चीजें (लकड़ी, फल, दवाइयाँ) कम। वाइल्डलाइफ हेबिटेट खत्म → मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा।
क्लाइमेट चेंज : ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ने से हीटवेव्स, अनियमित मौसम → स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर बोझ।
क्या इतना ज्यादा है कि “जीना मुश्किल” हो रहा? कुछ क्षेत्रों (नॉर्थईस्ट, वेस्टर्न घाट्स, हिमालय) में हाँ, बहुत गंभीर – वहाँ आपदाएँ सालाना हो रही हैं, लोग विस्थापित हो रहे हैं।
पूरे देश में नहीं, लेकिन प्रभाव बढ़ रहा है। अगर नहीं रोका गया तो 2030 तक और बदतर होगा।
सरकार रिफॉरेस्टेशन कर रही है (जैसे एक पेड़ माँ के नाम कैंपेन), लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और इल्लीगल कटाई जारी है।
विशेषज्ञ कहते हैं: सस्टेनेबल डेवलपमेंट, सख्त कानून और लोकल कम्युनिटी इन्वॉल्वमेंट जरूरी है।

